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December 09, 2025

131. अवगुंठन

सुख दुख

ये दो अवगुंठन

उलझाए रहते हैं मन

 

दूर सुबह की आभा 

छलका देती हास 

एक नई उलझी सी आशा 

नीड़ बना देती नित प्रात

 

पर आ-आकर संकट के पल 

बदल दिया करते हैं सारे 

मनोयोग से बने कार्यक्रम

 

ऐसे ही चलता है जीवन 

हर पल हर दिन 

रोज नया नित 

केवल सच है तो 

परिवर्तन

 

सुख दुख

ये दो अवगुंठन

उलझाए रहते हैं मन

 

(25 अगस्त, 1978)

 

(कल्पना की सीढ़ियों से)