146. Whom should I call my God?
मंथन
किसे मैं कहूं प्रिये भगवान ?
दिये जिसने ये पंथ अजान,
हमारे अंतः सुकोमल भाव
आंसुओं से साना अनजान !
उसे कैसे कह दूं भगवान ?
रचा करता है नव नव सृष्टि,
हास से कर देता फिर वृष्टि,
फेंक देता है उस पर नित्य,
हमारा हो इतना अपमान !
उसे कैसे कह दूं भगवान ?
खेलता है फिर वह शतरंज,
मोहरें बना हमें सविलास,
भरे नयनों में तीखा व्यंग्य,
अरे! उसमे इतना अभिमान !
उसे कैसे कह दूं भगवान ?
नहीं जिसका है कोई रूप, गंध पहचान,
नहीं सुनता जो मेरी बोल,
कांप उठता हूं मैं अनजान !
प्रिये, ये कैसा है भगवान ?
किसे मैं कहूं प्रिये भगवान ?
जगत में तुम्ही अकेली एक,
लिये दूग में करुणा का स्रोत,
सुनाती हो मंगलमय गान !
तुम्ही को कहता हूं भगवान ?
तुम्हारे होठों की मुस्कान,
मुझे कर लेती एकाकार,
तुम्ही देती हो आशीर्वाद,
पहनकर यह नीला परिधान !
तुम्ही तो हो जग की भगवान ?
तुम्हें कहता हूं प्रिय, भगवान !
बरस जाती हो पतझड़ बीच,
बढ़ा देती हो मेरी शान !
तुम्ही को कहता हूं भगवान ?
(27 जुलाई, 1977)
(कल्पना की सीढ़ियों से)