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December 24, 2025

146. Whom should I call my God?

मंथन


किसे मैं कहूं प्रिये भगवान ?

दिये जिसने ये पंथ अजान, 

हमारे अंतः सुकोमल भाव 

आंसुओं से साना अनजान !

 

उसे कैसे कह दूं भगवान ?

 

रचा करता है नव नव सृष्टि, 

हास से कर देता फिर वृष्टि, 

फेंक देता है उस पर नित्य, 

हमारा हो इतना अपमान !

 

उसे कैसे कह दूं भगवान ?

 

खेलता है फिर वह शतरंज, 

मोहरें बना हमें सविलास, 

भरे नयनों में तीखा व्यंग्य, 

अरे! उसमे इतना अभिमान !

 

उसे कैसे कह दूं भगवान ?

 

नहीं जिसका है कोई रूप, गंध पहचान, 

नहीं सुनता जो मेरी बोल, 

कांप उठता हूं मैं अनजान !

 

प्रिये, ये कैसा है भगवान ?

 

किसे मैं कहूं प्रिये भगवान ?

जगत में तुम्ही अकेली एक, 

लिये दूग में करुणा का स्रोत, 

सुनाती हो मंगलमय गान !

 

तुम्ही को कहता हूं भगवान ?

 

तुम्हारे होठों की मुस्कान, 

मुझे कर लेती एकाकार, 

तुम्ही देती हो आशीर्वाद, 

पहनकर यह नीला परिधान !

 

तुम्ही तो हो जग की भगवान ?

 

तुम्हें कहता हूं प्रिय, भगवान ! 

बरस जाती हो पतझड़ बीच, 

बढ़ा देती हो मेरी शान !

 

तुम्ही को कहता हूं भगवान ?

 

(27 जुलाई, 1977)

(कल्पना की सीढ़ियों से)